दादा हों या दीदी.......अंबेडकर, जिन्ना, गोलवलकर के जमाने से मतदाताओं से क्यों बार-बार एक ही तरह के सवाल कि, दलित हो क्या? मुसलिम हो क्या? हिंदू हो क्या? ....तो, इधर आओ, इधर आओ, इधर आओ। आज भी कोई मतदाता से नहीं पूछ रहा कि बेरोजगार हो क्या? भूमिहीन हो क्या? गरीब हो क्या? बीमार हो क्या? अशिक्षित हो क्या?........ लोकतंत्र के ढकोसलेबाज!!!
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सुबह सुबह का फ़र्क
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