दादा हों या दीदी.......अंबेडकर, जिन्ना, गोलवलकर के जमाने से मतदाताओं से क्यों बार-बार एक ही तरह के सवाल कि, दलित हो क्या? मुसलिम हो क्या? हिंदू हो क्या? ....तो, इधर आओ, इधर आओ, इधर आओ। आज भी कोई मतदाता से नहीं पूछ रहा कि बेरोजगार हो क्या? भूमिहीन हो क्या? गरीब हो क्या? बीमार हो क्या? अशिक्षित हो क्या?........ लोकतंत्र के ढकोसलेबाज!!!
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सुबह सुबह का फ़र्क
खाए-अघाए लोगों की सुबह- मोटिवेशन क चरा बीनते बच्चों की सुबह- दाना-पानी
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जार्ज आर्वेल ने 1948 में एक किताब लिखी जिसका शीर्षक था- 1984. इसमें समय से आगे एक समय की कल्पना की गई है, जिसमें राज सत्ता अपने नागरिकों प...
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उठो फिर से किसानों के तिरंगे की कसम खाओ, उठो, फिर से जवानों के तिरंगे की कसम खाओ, उठो उत्तर से, पश्चिम-पूर्व से कन्याकुमारी तक - चलो दिल्ली,...
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शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले वतन पर मिटने वालों का यही बाकी निशां होगा....
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